एक भयानक आदमी – 3
उस ने सोचा की पे चूकने के बाद यहाँ से उठ ही जाएगी. हाँ ज़रूर उठ जाएगी.
लेकिन उठ जाने का पक्का निश्चय कर लेने के बाद भी वो वहीं बैठी रही…..सोचती रही…….उसी अहमाक़ नौजवान के बड़े मे. एक घंटा बीट गया……तब फिर वो उसे दुबारा दिखाई दिया.
वो कसीनो के गाते पर खड़ा अपने चे
हरे से पसीना पोच्च रहा था. दोनों की निगाहें मिली. और वो तीर की तरह उसी टेबल पर आया.
“तुम ठीक कहती तीन.” वो एक कुर्सी पर बैठ कर हांफता हुआ बोला. “मैं ने टीन हज़ार रुपये खो दिया. (अब से 50 साल पहले 3 हज़ार )
“निधी उसे घूराती रही फिर दाँत पीस कर बोली “जाओ……..चले जाओ…..वरना उल्टा हाथ मार बैठूँगी….”
“नहीं……मैं नहीं जवँगा. तुम ने कहा था की बाहर ख़तरा है.”
निधी खामोश हो गयी. वो कुच्छ सोच रही थी.
“बताओ……मैं क्या करूँ?” मूरख नौजवान ने फिर कहा.
“गो तो हेल….”
“मैं भी कितना गढ़ा हूँ.” अहमाक़ खुद से बोला “भला ये बेचारी क्या बताएगी.”
अहमाक़ कुर्सी से उठ गया. निधी बुरी तरह झल्लाई हुई थी. उस ने थोड़ी सी भी परवाह नहीं की . वो उसे बाहर जाते देखती रही. यहाँ तक की वो मैं गाते से गुज़र गया.
अहमाक़ कुर्सी से उठ गया. निधी बुरी तरह झल्लाई हुई थी. उस ने थोड़ी सी भी परवाह नहीं की . वो उसे बाहर जाते देखती रही. यहाँ तक की वो मैं गाते से गुज़र गया.
अचानक उस की सोच की दिशा पलटी…….और वो फिर उसके लिए बेचैन हो गई. उस के मस्तिस्क मे बाहर के अंधेरे की कल्पना रेंगने लगी और वो व्याकुल सी होकर खड़ी हो गयी. वो फिर उस अहमाक़ के बड़े मे सोच रही थी. उस ने केवल 3 हज़ार गँवाए थे. लेकिन इसके बाद भी उसकी जेबों मे काफ़ी रकम होगी. वो बड़े नोटों की काई गद्दियाँ तीन. निश्चित रूप से 40-50 हज़ार हो सकता है या उस से भी अधिक.
उस ने बड़ी तेज़ी से अपना पर्स उठाया और होटेल से निकल गयी. बाहर अंधेरे का साम्राज्या था. काफ़ी दूरी पर उसे एक काली सी परचाय दिखाई दे रही थी. गतिशील परच्चायं. जो उस अहमक से साइवा दूसरा नहीं हो सकता था. सामने छ्होटे छ्होटे टीले थे……और बाईं तरफ घनी झाड़ियों का सिलसिला मीलों तक फैला हुआ था. सड़क पर पहुँचने के लिए उन टीलों के बीच से गुज़रना ज़रूरी था. लेकिन प्रेज़ेंट सिचुयेशन्स को देखते हुए ये समय इसके लिए मुनासिब नहीं था. खुद पुलिस भी इस इलाक़े को ख़तरनाक घोषित कर चुकी थी.
निधी दिल ही दिल मे खुद को बुरा भला कह रही थी. क्यों ना उस ने उस को उधर जाने से रोका. उस ने उसे वो रास्ता क्यों ना बताया जो बंदरगाह की तरफ जाता था.
अब वो इस उलझन मे प़ड़ गयी थी की वो उसे किस तरह आवाज़ दे. वो उसका नाम भी नहीं जानती थी.
अचानक उसे कुच्छ ही दूरी पर एक दूसरा साया भी दिखाई दिया……जो पहले साए के पिच्चे था……और अचानक किसी टीले को ओट से निकला था. फिर उस ने उसे अगले साए पर झपट‚ते देखा. और वो अपने मुहह से अचानक निकालने वाली चीख को ना दबा सकी थी. उसकी चीख सन्नाटे मे लहराती चली गयी थी.
दोनों साए एक दूसरे से गुठे हुए ज़मीन पर गिरे. फिर एक फिरे हुआ और एक साया उच्छल कर झाड़ियों की तरफ भागा.
निधी बाद-हवासी मे सीधी दौड़ती चली गयी.
उस ने तारों की छ्चाओं मे एक आदमी को ज़मीन पर पड़े देखा. दूसरा गायब हो चुका था.
उसे विश्वास था की वो अहमक आदमी के साइवा कोई ना होगा.
“क्या हुआ….?” वो बौखलाए हुए ढंग से उस पर झुक पड़ी.
“नींद आ रही है….” अहमाक़ ने भरराय हुई आवाज़ मे कहा.
“उठो….” वो उसे झंझोड़ने लगी. “भागो पूरी ताक़त से होटेल की तरफ भागो.”
अहमाक़ उच्छल कर खड़ा हो गया……और फिर उस ने बड़ी फुर्ती से निधी को कंधे पर लाद कर होटेल की तरफ भागना शुरू कर दिया. निधी “अरे अरे” ही कराती रह गयी.
फिर थोड़ी देर बाद दोनों एक दूसरे के सामने खड़े हाँफ रहे थे. दोनों होटेल के मैं गाते के करीब थे. फिरे और चीख की आवाज़ सुन कर यहाँ पहले ही से भीड़ जमा हो गयी थी.
“कहीं चोट तो नहीं आई?” निधी ने उस से पुचछा.
“चोट आई नहीं बल्कि चोट हो गयी. मैं इस समय कौड़ी कौड़ी का मुहताज हूँ.”
“होटेल का मॅनेजर उन्हें अंदर लाया और सीधा अपने कमरे मे लेता चला गया.
“आप ने बड़ी ग़लती की है.” उस ने अहमाक़ नौजवान से कहा.
“अरे श्रीमान मैं शाम को उधर ही से आया था.”
“क्या आप ने सड़क के किनारे लगे बोर्ड को नहीं देखा था जिस पर लिखा हुआ है की ‘7 बजे के बाद इस तरफ से जाने वालों की जान माल की सुरक्षा नहीं की जा सकती. ये बोर्ड पुलिस डिपार्टमेंट की तरफ से लगाया गया है.”
“क्या आप ने सड़क के किनारे लगे बोर्ड को नहीं देखा था जिस पर लिखा हुआ है की ‘7 बजे के बाद इस तरफ से जाने वालों की जान माल की सुरक्षा नहीं की जा सकती. ये बोर्ड पुलिस डिपार्टमेंट की तरफ से लगाया गया है.”
“मैं ने नहीं देखा था.”
“कितनी रकम गयी?” मॅनेजर ने पुचछा.
“47 हज़ार.”
“मी गोद….!” मॅनेजर की आँखें हैरात से फैल गयीं.
“और टीन हज़ार आप के कसीनो मे हार गया.”
“सॉरी….” मॅनेजर ने दुख भरे स्वर मे कहा “लेकिन जुवा तो किस्मत का खेल है…..हो सकता है की कल आप 6 हज़ार की जीत मे रहें.”
“उठो यहाँ से.” निधी अहमाक़ का हाथ पकड़ कर खींचती हुई बोली.
वो दोनों मॅनेजर के कमरे से बाहर निकल आए. एक बार फिर लोग उनके पास जमा हो गये थे…..लेकिन निधी उसे उन की भाड़ से निकाल ले गयी. वो दूसरी तरफ के गाते से बंदरगाह वाली सड़क पर जा रहे थे.
“क्यों तोते…..अब क्या ख़याल है?” निधी ने पुचछा.
“अब ख़याल ये है की मैं अपने रुपये वसूल किए बिना यहाँ से नहीं जवँगा. 50 हज़ार की रकम थोड़ी नहीं होती.”
“लेकिन तुम इतनी रकम ले कर आए ही क्यों थे?”
“मुझे 50 भैंसें(बफ्लॉस) ख़रीदनी थी.”
“भैंसें….?”
“हन…..भैंसें. और मैं उन भैंसॉं के बिना वापस नहीं जा सकता. क्यों की मेरे डॅडी थोड़ा करोधी टाइप के आदमी हैं.”
“क्या वो भैंसॉं का बिज़्नेस करते हैं?”
“नहीं…..उन्हें भैंसॉं से इश्क़ है.” अहमाक़ ने गंभीर स्वर मे कहा और निधी अनायास हंस पड़ी.
“हानेन्न्…..तुम मज़ाक समझती हो?” अहमाक़ ने हैरात से कहा “ये हक़ीकत है की वो अपने आस पास अधिक से अधिक भैंसें देख कर बहुत खुश होते हैं.”
“वो और क्या करते हैं…..मतलब इनकम के श्रोत क्या हैं?”
“ये तो मुझे नहीं पता.”
“तुम पागल तो नहीं हो?”
“पता नहीं….”
अब तुम्हारे पास कितनी रकम है?”
“शायद एक चवँनी……रकम की चिंता मत करो. मैं एक एक पायी वसूल कर लूँगा.”
“किस से?”
“जिस ने छ्चीनी है उस से.”
“तोते…..तुम एकदम गढ़े हो.” निधी हँसने लगी. पता नहीं ज़िंदा कैसे हो. वो आदमी अपने शिकारों को ज़िंदा नहीं छोड़ता.”
“वो आख़िर है कोन?”
“कोई नहीं जानता. पुलिस वाले इस इलाक़े मे कदम रखते हुए तर्राटे हैं. वो अब तक ना जाने कितने ओफ्फिसेरोन को जान से मार चुका है.”
“हो सकता है…………मगर मैं अपने रुपये वसूल कर लूँगा.”
“किस तरह बुद्धू तोते?”
“कल शाम से ही उन झाड़ियों मे चुप जवँगा.”
रयशी हँसने लगी.
“तोते तुम सच मच पागल हो.” उस ने कहा. “ये बताओ तुम ठहरे कहा हो?”
“होटेल बरस्का मे….”
“लेकिन अब तुम्हारी जेबें खाली हो चुकी हैं. वहाँ कैसे रहोगे?”
“उस की चिंता नहीं. वहाँ से किसी चॅरिटी धरामशाला मे चला जवँगा. लेकिन भैंसॉं के बिना वापसी नामुमकिन है.”
निधी खामोश हो गयी. बंदरगाह के निकट पहुँच कर उस ने एक टॅक्सी रुकवाई.
“चलो बैठो.”
“मुझे भुख लग रही है.”
“तो अब तुम चाहते हो की मैं तुम्हें खाना भी खिलओन?” निधी उसे टॅक्सी मे धकेल्टी हुई बोली. वो दोनों बैठ गये और टॅक्सी चल पड़ी.
“तुम ये ना समझो की मैं कंगाल हूँ. मैं ने ये कहा था की मेरी जेब मे केवल एक चवँनी है. लेकिन मैं उल्लू नहीं हूँ. परदेश मे अपना सारा माल एक जगह नहीं रखता.”
अहमाक़ खामोश हो कर अपने जूते का फीता खोलने लगा. उस ने दोनों जूते उतार दिए और उन्हें उल्टा कर के झटके देने लगा. दूसरे ही पल उस के हाथ पर नोटों की 2 गद्दियाँ तीन.
“ये ढाई हज़ार हैं.” अहमाक़ ने बड़ी सादगी से कहा.
“अगर अब मैं इन्हें हथिया लॅंड तो?” निधी मुस्कुरा कर बोली.
“तुम ऐसा कर ही नहीं सकतीं. मैं तुम्हें डरा दूँगा.”
“डरा दोगे……?”
“हन….मेरे पास रिवॉलव है और मैं ने उस आदमी पर भी फिरे किया था.”
“क्या तुम्हारे पास लाइसेन्स है?”
“मैं लाइसेन्स फिसेँसे की परवाह नहीं कराता……ये देखो मैं झूट नहीं कह रहा.”
एक भयानक आदमी – 3
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