एक भयानक आदमी – 2
“अगर उस ने यहाँ मिलने का वादा किया था तो वो कोई अच्छी लड़की नहीं हो सकती.”
“क्यों?” नौजवान चौंक कर बोला.
“लेकिन ये तो बताओ की तुम इतने रुपये क्यों साथ लिए घूम रहे हो?” निधी ने उस के सवाल को इग्नोर करते हुए पुचछा.
“जब तक इतनी रकम मेरी जेब मे ना हो……मैं घर से बाहर नहीं निकलता.”
अचानक एक दलाल ने निधी को
इशारा किया. शायद उस इशारे का यही मतलब था की उसे कसीनो मे ले चलो. लेकिन निधी ने उसकी तरफ से मूह फेर लिया.
इशारा किया. शायद उस इशारे का यही मतलब था की उसे कसीनो मे ले चलो. लेकिन निधी ने उसकी तरफ से मूह फेर लिया.
“तब तो हो सकता है की ये तुम्हारी ज़िंदगी की आखड़ी रात हो.” निधी ने नौजवान से कहा.
“क्यों….खमखा डरा रही हो?” नौजवान डारी डारी सी आवाज़ मे बोला. “मैं वैसे ही बहुत बाद-नसीब आदमी हूँ. पेट भर कर खाना नहीं खा सकता. कोई चीज़ ठंडी लगती है और कोई चीज़ कड़वी. बड़ा थर्ड क्लास होटेल है. मेरे नाना के गाव वाली सराई मे यहाँ से लाख दर्जा अच्छा खाना मिलता है.”
निधी अजीब निगाहों से उसे देख रही थी. कुच्छ देर खामोशी रही फिर वो उठता हुआ बोला “अच्छा अब मैं जवँगा.”
“शायद तुम इस शहर के ही नहीं हो.” निधी ने चिंतित स्वर मे कहा.
वो फिर बैठ गया.
“यहाँ से निकालने के बाद तुम्हें सड़क तक पहुँचने के लिए एक वीरना टाई करना पड़ेगा.” निधी कहा. “हो सकता है की तुम चीख भी ना सको और कटी इंच लंबा ठंडा लोहा तुम्हारे जिस्म मे उतार जाए.”
“मैं समझा नहीं.”
“तुम बाहर मार डाले जाओगे बुद्धू.” निधी दाँत पीस कर बोली “क्या तुम ने इस इलाक़े की भयानक घतनाओं के बड़े मे अख़बारों मे नहीं पढ़ा?”
“मैं कुच्छ नहीं जानता.” नौजवान ने बेचैनी से पहलू बदलते हुए कहा.
“वो लड़की किस समय आएगी?”
“श…..अब तो आठ बाज गये. उस ने सात बजे मिलने का वादा किया था.”
“तुम उसे कब से जानते हो?”
“कल से….”
“क्या मतलब?”
“हन…..हन कल से. कल वो मुझे रेलवे वेटिंग रूम मे मिली थी.”
“और तुम आज यहाँ दौड़े आए. सच मच बुद्धू हो.”
“बात ये है सीसी…..की…….”
“फ़िज़ूल बातें मत करो. तुम्हारे लिए दोनों सिचुयेशन्स ख़तरनाक हैं. लेकिन एक मे जान जाने का दर नहीं…..लेकिन लूट ज़रूर जाओगे.”
“तुम्हारी कोई भी बात मेरी समझ मे नहीं आ रही.”
“बाहर फैले हुए अंधेरे पर एक ख़तरनाक आदमी की हुकूमत है…..और वो आदमी कभी कभी यूँ ही मज़े के लिए भी किसी ना किसी को ज़रूर क़ातल कर देता है. मगर तुम………तुम तो सोने की चिड़िया हो……इस लिए तुम्हें जान और माल दोनों से हाथ धोना होगा.”
“किस मुसीबत मे फँस गया….!” नौजवान ने रुँधे हुए स्वर मे कहा.
“जब तक मैं ना कहूँ…..चुप छाप यहीं बैठे रहो.”
“लेकिन तुम ने यहाँ भी किसी ख़तरे की बात कही थी.”
“यहाँ तुम लूट्ट जाओगे प्यारे तोते….” निधी ने मुस्कुरा कर पलकें झपकाते हुए कहा. “इधर जुवा होता है और कसीनो के दलाल तुम्हारी ताक मे हैं.”
“वाह….वा…..” अहमक ने हंस कर कहा “ये तो बड़ी अच्छी बात है. मैं जुवा खेलना पसंद करूँगा. तुम मुझे वहाँ ले चलो.”
“श…..मैं समझी तुम यहाँ जुवा खेलने आए हो.”
“नहीं…..ये बात नहीं है…..अफ….वो अभी तक नहीं आई…..अरे भाई कसम ले लो, जुवा खेलने की नियत से नहीं आया था. मगर अब खेलूँगा ज़रूर. ऐसे मौके रोज़ रोज़ नहीं मिलते.”
“मतलब तुम वास्तव मे जुवरि नहीं हो?”
“नहीं…….मैं ये भी नहीं जानता की जुवा खेला किस तरह जाता है?”
“तब फिर कैसे खेलोगे?”
“बस…..किसी तरह. केवल एक बार तजुर्बे के लिए खेलना चाहता हूँ. सच कहता हूँ ऐसा मौका फिर कभी नहीं मिलेगा.”
“कैसा मौका?”
“बात ये है….” मूरख आगे झुक कर राझडारी भरे ढंग से बोला “ना यहाँ डॅडी हैं ना मम्मी.”
निधी की हँसी छ्चुत गयी. लेकिन उस नौजवान के चेहरे पर मूरखता भारी गंभीराता देख कर खुद भी गंभीर हो गयी और ना जाने क्यों उस समय वो खुद को भी मूरख महसूस करने लगी थी.
“डॅडी और मम्मी….” नौजवान फिर बोला…”मुझे कड़ी पाबंदियों मे रखते हैं. मगर मैं दुनिया देखना चाहता हूँ. मैं अब बड़ा हो गया हूँ ना…..है की नहीं……देख लो वो अब तक नहीं आई.”
“मैं तुम्हें जुवा ना खेलने दूँगी……समझे.”
“क्यों…..? वाह जी…….अच्छी रही. तुम हो कौन मुझे रोकने वाली. मैं ने आज से पहले कभी तुम्हें देखा तक नहीं.”
“तुम जुवा नहीं खेलोगे.” निधी अपना उपरी होन्ट भींच कर बोली.
“देखता हूँ तुम कैसे रोकती हो.”
इतने मे कसीनो का एक दलाल अपनी जगह से उठ कर उन की मेज़ की तरफ बढ़ा. शकल से ही ख़तरनाक आदमी लग रहा था. चेहरे पर घनी मुच्छें तीन और हल्के से खुले हुए होंतों से उस के दाँत दिखाई देते थे. आँखों से दरिंदगी झाँक रही थी. वो एक कुर्सी खींच कर निधी के सामने बैठ गया.
“क्या तुम्हारे दोस्त हैं?” उस ने निधी से पुचछा.
“हन…” निधी के लहजे मे कड़वाहट थी.
“क्या पहली बार यहाँ आए हैं?”
“हन…..हन….” निधी झल्ला गयी.
“नाराज़ लग रही हो.” वो लगवत के ढंग से बोला.
“जाओ…..अपना धनदा देखो. ये जुवरि नहीं है.”
“मैं ज़रूर जुवा खेलूँगा.” मूरख ने मेज़ पर घूँसा मार कर कहा. “तुम मुझे नहीं रोक सकतीं…..समझी.”
“श…..ये बात है.” दलाल निधी को घूर्ने लगा. उस की आँखों मे निधी के लिए वॉर्निंग झलक रही थी. फिर वो अहमक की तरफ मूड कर बोला…..”नहीं मिसटर…….आप को कोई नहीं रोक सकता. आप जैसे लकी लोग यहाँ से हज़ारों रुपये जीत कर ले जाते हैं. और आपकी चौड़ी पेशानी खुश किस्मती और जीत की पहचान है. मेरे साथ आइए. मैं आप को यहाँ खेलने के गुर बतावँगा. जीत पर केवल 15% कमिशन. बोलिए ठीक है ना?”
“बिल्कुल ठीक है यार….” अहमक उस के फैले हुए हाथ पर हाथ माराता हुआ बोला. “उठो….”
निधी वहीं बैठी रह गयी और वो दोनों उठ कर कसीनो की तरफ चले गये. निधी बिना कारण बोर होती रही. उसे तकलीफ़ पहुँची थी. पता नहीं क्यों. वो जहाँ थी वहीं बैठी रही. उसके दिमाग़ मे आँधियाँ सी उठ रही तीन. बड़ी अजीब बात थी. आज उस से पहली मुलाकात थी. वो भी ज़बरदस्ती की. लेकिन इस के बाद भी वो महसूस कर रही थी जैसे उस अहमाक़ के रवैये के कारण बरसों पूरेानी दोस्ती टूट गयी हो. उस ने उस का कहना क्यों नहीं माना. उस की बात क्यों रद्द कर दी.
फिर उसे अपनी इस मूरखता पर हँसी आने लगी. आख़िर वो उसे माना करने वाली होती कोन है. पता नहीं वो कोन है? कहाँ से आया है? कल कहाँ होगा. ऐसे आदमी के लिए इस किस्म की भावना रखना मूरखता नहीं तो और क्या है.
इस से पहले सैकड़ों लोगों से मिल चुकी थी……और उन्हें अच्छी तरह लूट‚ते समय भी उस के दिल मे रहम की भावना नहीं पैदा हुई थी. लेकिन इस अहमाक़ नौजवान को दूसरों के हाथों लूट‚ते देख कर ना जाने क्यों उस की इंसानियत जाग उठी थी. उसे ऐसा लग रहा था जैसे उसका कोई नालयक लड़का उस का दिल तोड़ गया हो.
“ऑश…..जहन्नुम मे जाए.” वो धीरे से बर्बदाई……और वेटर को बुला कर एक पेग विस्की का ऑर्डर दिया.
फिर उस ने इस तरह अपने सर को झटका दिया जैसे उस अहमाक़ की कल्पना से पिच्छा च्चुदाना चाहती हो.
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